दो पल के जीवन से इक उम्र चुरानी है | रोशनलाल गोरखपुरिया

जिस प्रकार उदासी कहीं बाहर से नहीं आती, उसी प्रकार खुशियां भी बाजार में नहीं मिलती। जो मुस्कुराता नहीं, वो इंसान नहीं। क...

जीवन की आपाधापी में हम ऐसे गुम हो गए हैं कि जीवन जीना ही भूल गए है। जीवन जागने का नाम है, भागने का नहीं। पिछले दिनों एक हिंदी साहित्यकार की रचना पढ़ रहा था। उनके आलेख के एक शीर्षक ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। शीर्षक था पूरी पृथ्वी एक शोक सभा सी लगती है उनके इस शीर्षक ने मानों मुझे झकझोरकर रख दिया। मनुष्य जीवन परमात्मा की सबसे बड़ी कृति है और उस जीवन को हम लोगों ने मायूसी की गिरफ्त में ले रखा है। एक सर्वे की मानें तो विश्व में हर दस में से  व्यक्ति उदासी की दौर से गुजर रहा है। बहुत बड़ी विडम्बना है। क्या ये परमात्मा का तिरस्कार नहीं है? इससे मुक्त होने के लिए हमें अपने अन्दर झांकने की जरुरत है। जिस प्रकार उदासी कहीं बाहर से नहीं आती, उसी प्रकार खुशियां भी बाजार में नहीं मिलती। जो मुस्कुराता नहीं, वो इंसान नहीं। कहीं हमने अपनी इंसानियत तो नहीं खो दी? 

आलेख का शीर्षक दो पल के जीवन से इक उम्र चुरानी है जीवन को देखने का एक नया नजरिया देता है। अबूब नाम के एक फकीर थे। एक दिन उन्हें पता चला कि एक बादशाह अपनी सेना लेकर किसी राज्य पर आक्रमण करने जा रहा हैं। सेना को कब्रिस्तान से होकर ही निकलना था, अन्य कोई मार्ग नहीं था। अबूब उस कब्रिस्तान में जाकर बैठ गए। वो कब्र को खोदते और कब्र की मिट्टी को हाथ में लेकर सूंघते और गिरा देते थे। फिर वह मिट्टी को तोलने लगते। बादशाह ने फकीर को बुलाकर पूछा- तुम कौन हो और तुम यहाँ क्या कर रहे हो? अबूब ने कहा- यदि आप बादशाह है तो मैं शाहंशाह हूँ। मैं कब्रो की मिट्टी को सूंघ कर और उन्हें तोलकर यह अन्दाजा लगा रहा हूँ कि कौन सी कब्र किसकी है। कौन सी गरीब की है और कौन सी अमीर की? मुझे यह पता लगाना है कि आप जैसे बादशाहों की कौन सी कब्र है और मेरे जैसे शाहंशाहों की कौन सी कब्र है। अबूब साहब की बात सुनकर बादशाह को गुस्सा गया। उसने उत्तेजित होकर कहा- बेवकूफ! क्या तुम नहीं जानते कि यहाँ एक बार दफनाने के बाद यह पता नहीं लगता कि कौन सी कब्र किसकी है? फकीर बोला- जनाब! आप जो चाहे कह सकते हैं क्योंकि आप बादशाह है। मेरा तो मानना है कि जिसके पास जितनी धन-दौलत होती है, उसे उतना ही घमंड होता है। उसे बोलने का होश नहीं रहता है। बादशाह क्रोध से गरजता हुआ बोला- आखिर तुम कहना क्या चाहते हो साफ-साफ कहो! अब फकीर शांत स्वभाव से कहने लगा- जरा सोचिए, यह वही कब्रिस्तान है जहाँ आपके पूर्वज दफनाए गए थे। यहाँ आपके द्वारा सताए गए अनेक लोगों की कब्र मौजूद हैं। मैंने स्वयं इन लाशो को कब्रों में उतरते देखा हैं। आज यदि मैं उनकी पहचान कर रहा हूँं तो इसमें कौन सी नासमझी हैं? कब्रिस्तान में आकर सब एक समान हैं। एक एक दिन आपको भी यहाँ आना पड़ेगा। यह जीवन का सबसे बड़ा सच है। तो फिर सेना सजाकर अन्य राज्यों पर आक्रमण करने क्यों जा रहे है? अबूब की बातो ने राजा को अत्यन्त प्रभावित किया और उसने आक्रमण का इरादा छोड़ दिया। कहानी के भावार्थ को इन दो पंक्तियों के माध्यम से भी प्रदर्शित किया जा सकता है वक्त के पंजें से बचकर  कोई कहां गया है मिट्टी से पूछिए सिकंदर कहां हैं। दो पल के जीवन से एक उम्र चुरानी है। यही तो जीवन है। जीवन को हम बचपन, जवानी और बुढ़ापे के शीशें में देखतें हंै। जीवन का दर्पण तो आनन्द है। जीवन तो आसमान में उड़ते स्वतंत्र परिदों का नाम है। जीवन नदी के किनारों का नही, नदी की कलकल बहती धाराओं का नाम है, यही अन्तर है, शीशे और दपर्ण का। शीशा संसार से परिचय कराता है और दर्पण अपने आप से। विश्व के महान विचारक लाओत्सो जब चीन छोड़कर हिमालय में अपना शरीर छोड़ने के लिए जा रहे थें तो उस देश के सम्राट ने सारे देश में आज्ञा भिजवाई कि जहां कही भी लाओत्सो सीमा पार करें, उन्हें पकड़ लिया जाए और मजबूर किया जाए - कि जब तक वह अपना अनुभव लिख दे तब तक उन्हें देश से बाहर जाने दिया जाए। उन्हें पकड़ लिया गया और जिस व्यक्ति ने उन्हें पकड़ा वह लाओत्सो को बहुत प्रेम करता था। अपनी आँखो में आँसु लिए उसने लाओत्सो से कहा मुझे आज्ञा का पालन करना ही होगा। यह मेरी झोपड़ी है यहाँ मीलों तक कोई और घर नहीं है। मैं आपको जाने दूंगा। आप मेरी झोपड़ी में विश्राम करें और कृप्या अपना अनुभव लिख दें। लाओत्सो को लिखना ही पड़ा। तीन दिन में उन्होनें अपनी छोटी सी किताब पूरी की। बस एक छोटी सी किताब, थोड़े से पृष्ठ। पुस्तक का प्रथम वाक्य था कि सत्य कहा नहीं जा सकता, जिस क्षण तुम उसे कहते हो, वह एक झूठ हो जाता है इसलिए मेरी किताब पढ़ते समय, कृप्या यह स्मरण रखें कि मैं इसे मजबूरी में लिख रहा हूँ। मैं अपनी पूरी चेष्ठा करूंगा, लेकिन फिर भी यह एक सुंदर झूठ ही रहेगा। सच को पारिभाषित नही किया जा सकता क्योंकि मृत शब्द कभी भी जीवित सत्य को परिभाषित नही कर सकते।

उपरोक्त कहानी में लाओत्सो के वक्तव्य ने ये स्पष्ट कर दिया है कि उम्र को जिया जा सकता है लिखा नहीं जा सकता।


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रोशनलाल गोरखपुरिया

लेखक | आध्यात्मिक विचारक | सामाजिक कार्यकर्ता 

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